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हिंसा

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  प्रत्येक सुबह-सवेरे हम दैनिक समाचार पत्र के पृष्ठ पलटते हैं तो वो हिंसा की तमाम ताज़ा ख़बरों से भरे रहते हैं. कहीं किसी को असमय गला घोंट कर मार डाला गया. कहीं किसी अकेले वृद्ध की घर पर हत्या कर दी गयी आदि. महात्मा गाँधी जी की अनमोल सीख यानि हिंसा छोड़ो, अहिंसा अपनाओ को देश के अधिकतर निवासी भुला बैठे हैं. क्या कभी किसी ने सोचा है कि अधिकतर मनुष्य हिंसक क्यों होते जा रहे हैं? इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन यहाँ हम मुख्य कारण जिससे हिंसा को बढ़ावा मिलता है वो सिने-निर्माताओं द्वारा जैसी फिल्मों का निर्माण किया जाता है जिसमें अधिक हिंसात्मक दृश्य दिखाए जाते हैं इन्हीं के कारण देश के लोग हिंसा में अधिक सक्रिय हो जाते हैं. जब देश के लोग इन निर्माताओं से प्रश्न करते हैं कि आप लोग तमाम सामाजिक विषयों पर फ़िल्में बनाते हैं तो उनमें हिंसा पर ही अधिक ध्यान क्यों केन्द्रित करते हैं. आपकी हिंसात्मक फिल्मो को देखकर देश का युवा वर्ग अपने असली जीवन में भी हिंसा को अपनाने लगता है. इसपर इन निर्माताओं का सीधा-सपाट उत्तर होता है कि हम अपनी फिल्मो में उसी कहानी को दिखाते हैं जो आजकल समाज में हो रहा है. ...

घरेलू हिंसा के तमाम मुक़दमे फर्जी भी होते हैं

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498-A के घरेलू हिंसा के तमाम मुकदमें फर्जी भी होते हैं. कन्या के मायके वाले जब वर पक्ष को परेशान करना चाहते हैं तब वो इस धारा का सहारा लेकर कन्या के ससुराल वालों के खिलाफ फर्जी मुकदमा दायर कर उनको जेल भिजवा देते हैं तथा उन्हें जमानत भी नहीं मिलती. गहन जांच के पश्चात पता चलता है कि वर पक्ष वालों की बेजा दहेज़ मांग से परेशान होकर उनसे हिसाब चुकता करना चाहते है इसलिए ऐसा अजीब काम किया. अदालतों में जो तरह-तरह के मुकदमें विचाराधीन हैं सरकार को चाहिए कि दूसरी जांच एजेंसी द्वरा परीक्षण कर उनका निपटारा किया जाये. दोनों पक्ष के वकील   यही चाहते हैं कि ऐसे मुकदमों का जल्दी निपटारा न हो तथा उन्हें अपनी फीस लगातार मिलती रहे. यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम इस तरह के कानूनों को समाप्त करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते. मैं चाहता हूँ कि देश तथा प्रदेश की सरकारें इस लाइलाज बीमारी का शीघ्र से शीघ्र समाधान ढूँढने का प्रयत्न करें.